आज हम आपको कुछ ऐसी तस्वीरों से रू-ब-रू करवाते हैं, जो आपने इससे पहले कभी नहीं देखी होंगी. तो चलिए आपको तस्वीरों के ज़रिए उस वक़्त में ले चलते हैं, जहां हर भारतीय की दिल बसता है.
Saturday, 11 February 2017
फ़ोर्ब्स मैगज़ीन की ‘30 Under 30’ लिस्ट में शामिल हुआ IIT-कानपुर के तीन पूर्व छात्रों का नाम
ख़बर ये है कि IIT- कानपुर के तीन पूर्व छात्रों को फ़ोर्ब्स मैगज़ीन की 2017 की टॉप 30 अंडर 30, सूची में जगह मिली है. इन तीनों छात्रों ने बड़ा कारनामा कर दिखाया है.
लखनऊ के रहने वाले फरीद अहसान (24), गोरखपुर के भानू प्रताप सिंह (25) और गाजियाबाद के अंकुश सचदेव (23) को सोशल नेटवर्किंग ऐप 'शेयरचैट' बनाने के लिए इस लिस्ट में शामिल किया गया है. आपको बता दें कि फ़ोर्ब्स मैगज़ीन के फरवरी एडिशन में इस लिस्ट को जारी किया गया है.
फरीद, भानू और अंकुश द्वारा 'शेयरचैट' ऐप को खासतौर पर उन लोगों के लिए बनाया गया है, जो हिन्दी बोलते, लिखते और पढ़ते हैं, या जो इंग्लिश समझ नहीं पाते हैं. यह ऐप उनके लिए अंग्रेजी को आसान बनाने का काम करेगा.
हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, भानू ने बताया कि हमारा इंटरेस्ट हमेशा से तकनीक की तरफ ही था और इसी जुनून और ललक ने हमें इंटरनेट से जुड़े प्रोडक्ट्स बनाने के लिए प्रेरित किया. शुरुआत में हमको कई विफ़लताओं का सामना करना पड़ा और कई बार हमारे प्रोडक्ट्स को ठुकराया भी गया, लेकिन लगातार कोशिश करने के बाद अब जाकर 'शेयरचैट' के रूप में हमें सफ़लता हासिल हुई है. फिलहाल, 'शेयरचैट' यूजर्स की संख्या हर महीने लगभग 30 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है.
ग़रीब और ज़रुरतमंद लोगों की मदद करने के लिए हमारी टीम की ओर से इन सुपरस्टार्स को दिल से शुक्रिया
इंसान अपनी मेहनत से किसी भी मुकाम तक जा सकता है, मगर वो अपनी सफ़लता को कितने दिनों तक संजो सकता है, ये उस पर निर्भर करता है.
यूं तो बॉलीवुड में कई सुपरस्टार हैं, जो दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं. वे अपनी मेहनत से रोज़ सफ़लता के झंडे गाड़ रहे हैं. ये इसलिए हो पा रहा है, क्योंकि उनकी फ़िल्मों को जनता देखती है. वो जनता ही होती, जो एक आम इंसान को सुपरस्टार बना देती है. ख़ैर, कई स्टार्स को इस बात की जानकारी होती है, वहीं कुछ लोगों को इसका अहसास भी नहीं होता. आज हम उन स्टार्स के बारे में बात करेंगे, जो रील और रियल लाइफ़, दोनों में जनता के दिलों पर राज़ कर रहे हैं.
अमिताभ बच्चन ने ग़रीब किसानों की मदद पैसे देकर की. इतना ही नहीं, ये UNICEF की महत्वकांक्षी परियोजना Pulse Polio, भारत सरकार की कैंपेन 'Save Our Tigers' से भी जुड़े रहे.
सलमान अपना गैर-सरकारी संगठन Being Human चलाते हैं. इसकी मदद से वे उन कैदियों की मदद करते हैं, जो अपनी सज़ा पूरी कर चुके हैं, मगर आर्थिक तंगी के कारण जेल से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. इसके अलावा सलमान ख़ान कई ज़रुरमंदों को पैसे डोनेट करते हैं.
प्रियंका चोपड़ा सामाजिक कार्य भी ख़ूब करती हैं. वे देश-भर के कई गांवों में इको-फ्रेंडली प्रोजेक्टस चलाती हैं. इतना ही नहीं, NDTV के ग्रीनीथन की वे ब्रांड एंबेसडर भी हैं.
ऐश्वर्या सोशल कामों से भी ख़ूब लगाव रखती हैं. उन्होंने अपनी आंखें Eye Bank Association of India को दान कर दिया है. इतना ही नहीं, वे ज़रुरतमंद लोगों के लिए ऐश्वर्या राय फाउंडेशन चलाती भी चलाती हैं.
बॉलीवुड एक्ट्रेस प्रीति जिंटा महिला भ्रुण हत्या के ख़िलाफ़ हैं. वे इसके लिए काम भी करती हैं. इतना ही नहीं, विधवा महिलाओं और एड्स से ग्रसित व्यक्तियों की वो मदद करती हैं.
ग़रीब और ज़रुरतमंद लोगों की मदद करने के लिए हमारी टीम की ओर से इन सुपरस्टार्स को दिल से शुक्रिया
Saturday, 14 January 2017
ट्रेन
वो ट्रेन के रिजर्वेशन के डब्बे में बाथरूम के तरफ वाली एक्स्ट्रा सीट पर बैठी थी,……
उसके चेहरे से पता चल रहा था कि थोड़ी सी घबराहट है उसके दिल में कि कहीं टीसी ने आकर पकड़ लिया तो।
कुछ देर तक तो पीछे पलट-पलट कर टीसी के आने का इंतज़ार करती रही।
शायद सोच रही थी कि थोड़े बहुत पैसे देकर कुछ निपटारा कर लेगी। देखकर यही लग रहा था कि जनरल डब्बे में चढ़ नहीं पाई इसलिए इसमें
आकर बैठ गयी, शायद ज्यादा लम्बा सफ़र भी नहीं करना होगा।
सामान के नाम पर उसकी गोद में रखा एक छोटा सा बेग दिख रहा था। मैं बहुत देर तक कोशिश करता रहा पीछे से उसे देखने की कि शायद चेहरा
सही से दिख पाए लेकिन हर बार असफल ही रहा।
फिर थोड़ी देर बाद वो भी खिड़की पर हाथ टिकाकर सो गयी। और मैं भी वापस से अपनी किताब पढ़ने में लग गया।
लगभग 1 घंटे के बाद टीसी आया और उसे हिलाकर उठाया।
“कहाँ जाना है बेटा”
“अंकल अहमदनगर तक जाना है”
“टिकेट है ?”
“नहीं अंकल …. जनरल का है ….
लेकिन वहां चढ़ नहीं पाई इसलिए इसमें बैठ गयी”
“अच्छा 300 रुपये का पेनाल्टी बनेगा”
“ओह … अंकल मेरे पास तो लेकिन 100 रुपये ही हैं”
“ये तो गलत बात है बेटा …. पेनाल्टी तो भरनी पड़ेगी”
“सॉरी अंकल …. मैं अलगे स्टेशन पर जनरल में चली जाउंगी …. मेरे पास सच में पैसे नहीं हैं …. कुछ परेशानी आ गयी, इसलिए
जल्दबाजी में घर से निकल आई …
और ज्यदा पैसे रखना भूल गयी…. ” बोलते बोलते वो लड़की रोने लगी टीसी उसे माफ़ किया और 100 रुपये में उसे अहमदनगर तक उस डब्बे
में बैठने की परमिशन देदी।
टीसी के जाते ही उसने अपने आँसू पोंछे और इधर-उधर देखा कि कहीं कोई उसकी ओर देखकर हंस तो नहीं रहा था।
थोड़ी देर बाद उसने किसी को फ़ोन लगाया और कहा कि उसके पास बिलकुल भी पैसे नहीं बचे हैं … अहमदनगर स्टेशन पर कोई
जुगाड़ कराके उसके लिए पैसे भिजा दे, वरना वो समय पर गाँव नहीं पहुँच पायेगी।
मेरे मन में उथल-पुथल हो रही थी, न जाने क्यूँ उसकी मासूमियत देखकर उसकी तरफ खिंचाव सा महसूस कर रहा था,
दिल कर रहा था कि उसे पैसे देदूं और कहूँ कि तुम परेशान मत हो … और रो मत …. लेकिन एक अजनबी के लिए इस तरह की बात
सोचना थोडा अजीब था।
उसकी शक्ल से लग रहा था कि उसने कुछ खाया पिया नहीं है शायद सुबह से … और अब तो उसके पास पैसे भी नहीं थे।
बहुत देर तक उसे इस परेशानी में देखने के बाद मैं कुछ उपाय निकालने लगे जिससे मैं उसकी मदद कर सकूँ और फ़्लर्ट भी ना कहलाऊं। फिर
मैं एक पेपर पर नोट लिखा,
“बहुत देर से तुम्हें परेशान होते हुए देख रहा हूँ, जनता हूँ कि एक अजनबी हम उम्र लड़के का इस तरह तुम्हें नोट भेजना अजीब भी होगा और शायद तुम्हारी नज़र में गलत भी, लेकिन तुम्हे इस तरह परेशान देखकर मुझे बैचेनी हो रही है इसलिए यह 500 रुपये दे रहा हूँ , तुम्हे कोई अहसान न लगे इसलिए मेरा एड्रेस भी लिख रहा हूँ ….. जब तुम्हें सही लगे मेरे एड्रेस पर पैसे वापस भेज सकती हो ….वैसे मैं नहीं चाहूँगा कि तुम वापस करो ….. अजनबी हमसफ़र ”
एक चाय वाले के हाथों उसे वो नोट देने को कहा, और चाय वाले को मना किया कि उसे ना बताये कि वो नोट मैंने उसे भेजा है। नोट मिलते ही उसने दो-तीन बार पीछे पलटकर देखा कि कोई उसकी तरह देखता हुआ नज़र आये तो उसे पता लग जायेगा कि किसने भेजा। लेकिन मैं तो नोट भेजने के बाद ही मुँह पर चादर डालकर लेट गया था। थोड़ी देर बाद चादर का कोना हटाकर देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कराहट महसूस की। लगा जैसे कई सालों से इस एक मुस्कराहट का इंतज़ार था। उसकी आखों की चमक ने मेरा दिल उसके हाथों में जाकर थमा दिया …. फिर चादर का कोना हटा- हटा कर हर थोड़ी देर में उसे देखकर
जैसे सांस ले रहा था मैं। पता ही नहीं चला कब आँख लग गयी। जब आँख खुली तो वो वहां नहीं थी …
ट्रेन अहमदनगर स्टेशन पर ही रुकी थी। और उस सीट पर एक छोटा सा नोट रखा था ….. मैं झटपट मेरी सीट से उतरकर उसे उठा लिया .. और उस पर लिखा था…
Thank You मेरे अजनबी हमसफ़र ….
आपका ये अहसान मैं ज़िन्दगी भर नहीं भूलूँगी …. मेरी माँ आज मुझे छोड़कर चली गयी हैं …. घर में मेरे अलावा और कोई नहीं है इसलिए
आनन – फानन में घर जा रही हूँ।
आज आपके इन पैसों से मैं अपनी माँ को शमशान जाने से पहले एक बार देख पाऊँगी ….
उनकी बीमारी की वजह से उनकी मौत के बाद उन्हें ज्यादा देर घर में नहीं रखा जा सकता। आजसे मैं आपकी कर्ज़दार हूँ …
जल्द ही आपके पैसे लौटा दूँगी। उस दिन से उसकी वो आँखें और वो मुस्कराहट जैसे मेरे जीने की वजह थे …. हर रोज़ पोस्टमैन से पूछता था शायद किसी दिन उसका कोई ख़त आ जाये …. आज 1 साल बाद एक ख़त मिला … आपका क़र्ज़ अदा करना चाहती हूँ …. लेकिन ख़त के ज़रिये नहीं आपसे मिलकर … नीचे मिलने की जगह का पता लिखा था …. और आखिर में लिखा था .. अजनबी हमसफ़र ……
Thursday, 5 January 2017
डाकघरों को मिला बैंक का दर्जा, नया नाम होगा इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक
भारतीय डाक को एक बैंक में तब्दील करने की सरकार की मंशा अब पूरी हो गई है। आरबीआइ ने भारतीय डाक को पेमेंट बैंक के तौर पर काम करने के प्रस्ताव को पहले ही मंजूरी दे दी थी और अब केंद्र सरकार ने भी इसे हरी झंडी दिखा दी है।
केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि देश भर के डाकघरों को बैंक का दर्जा दिया गया है और ये बहुत जल्द ही ‘इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक’ के नाम से जाना जाएगा।
जल्द ही देश भर भारतीय पोस्ट पेमेंट बैंक (आइपीपीबी) के नाम से यह काम शुरु कर देगा। कैबिनेट ने फिलहाल पोस्ट बैंक को देश भर में 650 ब्रांच खोलने की इजाजत दी है लेकिन यह सिर्फ शुरुआत है। बैंक पूरी तरह से प्रोफेशनल तरीके से चलाया जाएगा। संचार मंत्रालय इसके लिए एक सीइओ व अन्य प्रोफेशनल कर्मचारियों की नियुक्ति करेगा।
पेमेंट बैंक सितंबर 2017 से काम करना शुरू कर देगा। पोस्ट बैंक का पूंजी आधार 800 करोड़ रुपये होगा जिसमें 400 करोड़ रुपये इक्विटी के तौर पर और शेष 400 करोड़ रुपये की राशि बतौर ग्रांट उपलब्ध कराई जाएगी। यह पूरी तरह से सरकार की सौ फीसद हिस्सेदारी वाला उपक्रम होगा। प्रसाद ने बताया कि पहले उनके मंत्रालय ने तीन वर्षो में पोस्ट बैंक का पूरा विस्तार करने की योजना बनाई थी लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी ने इस काम को एक वर्ष के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया है। संचार मंत्रालय ने इस चुनौती को स्वीकार किया है।
650 शाखाएं अौर 5000 नए एटीएम लगेंगे
वैसे तो इसके अभी सिर्फ 650 शाखाएं होंगी लेकिन भारतीय डाक के तकरीबन डेढ़ लाख डाक घर और इसमें कार्यरत 1.7 लाख डाकिये भी इसकी सेवाओं के प्रसार में अहम भूमिका निभाएंगे। वैसे 650 शाखाओं के लिए 3500 नए कर्मचारियों की भर्ती भी होगी। साथ ही 5000 नए एटीएम भी खोले जाएंगे। मौजूदा डाक घरों को बैंकिंग सोल्यूशंस से जुड़े तकनीकी से पोस्ट बैंक से जोड़ दिया जाएगा। जिससे दूर दराज के गांव के लोगों को भी हर तरह की बैंकिंग सेवा मिलेगी।
प्रसाद ने बताया कि डाकिये को पोस्ट बैंक के मुताबिक बनाने का काम भी शुरु हो रहा है। हर डाकिये को आइ-पैड और बेहतर स्मार्ट फोन देने के सुझाव पर विचार हो रहा है। वैसे हर डाकिये को एक छोटा सा हैंड हेल्ड मशीन भी दी जाएगी जिससे वे ग्राहकों को घर पर ही हर तरह की बैंकिंग सेवा दे सकेंगे। पोस्ट बैंक कई तरह की सेवाएं देगा मसलन दूसरे बैंकों के लिए मासिक किस्त वसूलना, साधारण व जीवन बीमा देना, पेंशन, म्यूचुअल फंड्स आदि में निवेश की सुविधा उपलब्ध कराने का काम भी यह करेगा।
क्या क्या करेगा पोस्ट बैंक
1. एक लाख रुपये तक का भुगतान व जमा
2. दूसरे बैंकों के लिए मासिक किस्त वगैरह वसूलना
3. बीमा, पेंशन व म्यूचुअल फंड की बिक्री
4. सरकार की स्कीमों को ग्रामीण इलाकों में पहुंचाना
IIT बॉम्बे के छात्रों द्वारा बनाया गया सैटेलाइट ‘प्रथम’ लॉन्च
गौरतलब है कि ‘प्रथम’ या ‘SCATSAT-1 ’पहला सैटेलाइट कार्यक्रम है, जिसे देश में स्टूडेंट्स के द्वारा शुरू किया गया. इसे पांच साल के सागर और मौसम का अध्ययन करने के लिए भेजा जाएगा. इसके अलावा प्रथम के साथ अल्जीरिया, कनाडा और अमेरिका के साथ बंगलूरु के बनाए गए सैटेलाइट शामिल होंगे.
दरअसल, मुख्य सैटेलाइट 720 किलोमीटर की ऊंचाई पर सूर्य-स्थैतिक कक्षा में रहेगा. इन सैटेलाइट से होने वाले वैज्ञानिक अध्ययन से संचार त्रुटियों को ठीक करने में मदद मिलेगी और सुनामी की चेतावनी में भी मदद मिलेगी. इसके सफल प्रक्षेपण से मौसम का सटीक अंदाज़ा लगाने में काफ़ी सहायता मिलेगी
इस तरह तकनीक के क्षेत्र में भारतीय छात्रों ने अंतरिक्ष विज्ञान में एक नया आयाम हासिल करने की ओर अपना कदम बढ़ा दिया है.

Thursday, 29 December 2016
यूं जीत लिया जिंदगी की रोशनी ने कैंसर के अंधेरों को
हरमाला बताती हैं, ‘बात उन दिनों की है जब मैं शादी के बाद मॉन्ट्रियल में अपनी थीसिस पूरी कर रही थी। जिंदगी में जो कुछ चाहिए था, सब था। अच्छा पति, तीन साल का बेटा, सुखमय जीवन और कुछ करने की चाह। तभी अचानक सब कुछ बदल गया। सन 1986 में, जब मैं 33 साल की थी, पता चला कि मुझे कैंसर है और वह भी चौथे स्टेज का। एक पल को लगा जिंदगी मुझसे रूठ गई। अब सब कुछ खत्म होने को है। लेकिन अपने सामने छोटे से बेटे को देख जीने की इच्छा ने साथ नहीं छोड़ा। इलाज चला। सही ट्रीटमेंट और घरवालों के सहयोग ने टूटने नहीं दिया। इस पूरी प्रक्रिया में मैंने यह जाना कि कैंसर जैसी बीमारी को झेलना आसान नहीं है और उस पर से समाज का रवैया बची-खुची उम्मीद को खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। लोग कैंसर जैसी बीमारी का नाम लेने से भी डरते हैं।
‘एक लंबी प्रक्रिया और मानसिक व शारीरिक कष्ट के बाद मैं ठीक तो हो गई, लेकिन इस नागवार डरावनी बीमारी की अनेक सच्चाइयों से रूबरू भी हो गई। मेरे पास इलाज के लिए पैसा भी था और साधन भी। ऐसे अनेक लोग हैं जो न ठीक से इलाज ही करवा पाते हैं और न ही उन्हें सेवा और आत्मीयता मिल पाती है। वे बीमारी से ज्यादा हालात से मजबूर हो हार मान लेते हैं। मुझे अब अपने जीने का मकसद मिल गया था। मुझे ऐसे ही लोगों के लिए काम करना था। ’
कैंसर पीड़ितों के लिए मदद का हाथ
‘1987 में भारत आकर मैंने कैन सपोर्ट नास से एक संस्था की शुरुआत की। इस संस्था को शुरू करने में ही ढेरों परेशानियां हुईं। आम लोग कैंसर पीड़ितों की मदद करने से भी हिचकते थे। जो लोग कैंसर से जूझ रहे थे यह इस बीमारी को मात दे चुके थे, सिर्फ वही कैंसर सहयोग को सहायता देने के लिए तैयार हो पाते थे। कुछ स्वयंसेवियों ने भी हमारा साथ दिया। हम कैंसर क्लीनिक जाते। कैंसर पीड़ितों की तकलीफ सुनते और कोशिश करते कि उनके इलाज को नि:शुल्क करवा पाएं। उन्हें सुनना, समझना और सांत्वना देना हमारा लक्ष्य था। इस बीमारी के प्रति लोगों में जागरूकता न के बराकर थी। लोगों को कैंसर से संबंधित सभी प्रकार की जानकारी देना भी हमारे दल का काम था।
‘दस साल एशिया के सबसे बड़े आई हॉस्पिटल श्रॉफ की मैं पीआर रही। लेकिन मुझे कुछ बड़ा करना था। अंबानी की तरह अपना बिजनेस साम्राज्य खड़ा करना था। इसी दिशा में सिल्वर लाइनिंग शुरू की। घने बादलों के बीच उम्मीद की किरण के रूप में। तब से फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मानव सेवा अवॉर्ड से लेकर ब्रेवरी अवॉर्ड जैसे तमाम पुरस्कार मिले। हर कदम पर बढ़ते हुए कड़वी लेकिन ठोस सच्चाइयो ंका सामना करना पड़ा। पर, इतने सालों के अपने अनुभव से मुझे एक ही बात समझ में आई है कि सपने आपके सामने होते हैं, आपको उसे हाथ बढ़ाकर पकड़ना भर होता है।’
Source - HT
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